द्विपाद शीर्षासन कैसे करते हैं

द्विपाद शीर्षासन

द्विपाद शिरासन का परिचय –

इस आसान को द्विपाद शिरासन ,द्विपाद शीर्षासन ,द्विपाद स्कन्धासन आदि नामो से पहचाना जाता है । योगगुरु वी.के .एस अयंगर जी ने इसे कठिनता के पैमाने पर 60 में से 24 अंक दिए है ।

अष्टांग विनयसा योग में यह मुद्रा मध्यवर्ती श्रृंखला में है । इस आसन को करने के बाद टिट्टिभासन अवश्य करना चाहिए ।

द्विपाद शीर्षासन -:

योग साधिका का नाम कनिष्का राठौर पिता डॉ रविन्द्र राठौर (उज्जैन योग इंस्टिट्यूट ब्रांच ऑफिस कानीपुरा रोड़ सेंटपॉल स्कूल के पास

योगगुरु -: पं.मिलिन्द्र त्रिपाठी

विशेष: यह आसन उन योग साधकों को करना चाहिए जो कि एक पाद शिरासन में अभ्यस्त है ।

इस आसान को करने के लिए शरीर मे लचीलापन बेहद आवश्यक होता है । नियमित अभ्यास के बाद ओर अनुभवी योग एक्सपर्ट की देखरेख में ही इस आसान को करना चाहिए ।

द्विपाद शीर्षासन विधि -:

दोनों पैर सामने की और फैलाकर बैठ जाएँ। एक पैर को दोनों हाथों के सहारे धीरे धीरे ऊपर ले जाते हुए एक पाद शिरासन करें।

इसी प्रकार से धीरे धीरे दूसरे पैर को भी कंधे पर रखें एवं दोनों पैरों को व्यवस्थित कर आपस में कैंचीनुमा ढंग से लॉक बनाकर फँसा लें, पर ज़बरदस्ती न करें।यह नियमित अभ्यास से ही संभव होने वाला आसान है ।

चुकी सारा भार नितम्बो पर आ जाता है । अब नितम्बों में संतुलन बनाते हुए धीरे धीरे नमस्कार की मुद्रा बनाएँ।

ध्यान –

इस आसान को करते समय ध्यान स्वाधिष्ठान चक्र पर लगाना चाहिए । श्वासक्रम/समय: धीरे धीरे रेचक करते हुए क्रमशः पैरों को कंधों पर रखें।

पैरों की मांसपेशियों का लचीला होना बेहद जरूरी है । अधिक जोर लगाकर यह आसान न करते हुए सावधानी पूर्वक आसान में जाना चाहिए । आसन की पूर्ण स्थिति में स्वभाविक श्वसन एवं रेचक ही करते हुए पैरों को निकालें। यथाशक्ति अभ्यास करें।

दूसरी विधि –

सर्वप्रथम आप पालथी लगाकर जमीन पर बैठें और पैरों को ढीला छोड़ दें। दोनों पैरों को एक साथ उठाकर भी सर के ऊपर से गर्दन के पीछे ले जाकर इस आसान को किया जा सकता है ।

द्विपाद शीर्षासन के लाभ लाभ -:

  • मेरुदण्ड एवं कमर में लोच-लचक पैदा कर उन्हें सशक्त बनाता है।
  • मधुमेह में फायदा पहुंचाता है । इसमें पैर और थाई आदि स्थानों की नस-नाड़ी की निर्मलता होती है।
  • यह शरीर के लचीलेपन को बढ़ाता है ।
  • पुरुष रोगों के लिए अत्यन्त लाभकारी आसान है ।
  • शरीर की ताकत और सहनशक्ति बढ़ाता है ।
  • इससे दोनों पैरों की नसों पर विशेष खिंचाव होता है।
  • इससे पैरों की मांसपेशियां स्वस्थ, सबल तथा सशक्त बनायी जा सकती हैं।
  • यह महिलाएँ को मासिक धर्म की समस्याओं से छुटकारा दिलाता है ।
  • उदरशूल या पेट सम्बन्धी विकारों में भी लाभ होता है।मोटापे से निजात दिलाता है।
  • बवासीर तथा गुदा, भगन्दर आदि में भी लाभ पहुंचता है।

सावधानियाँ -:

  • अनुभवी योग ट्रेनर की देखरेख में ही अभ्यास करें ।
  • जो स्वर चल रहा हो उस स्वर वाली साइड के पैर को उठाना चाहिए ।
  • प्रथम अभ्यासी 10 से 15 सेकेण्ड से ज्यादा अभ्यास न करें।
  • पहले एक पाद शिरासन का नियमित अभ्यास करने के बाद ही इस आसान का अभ्यास किया जाना चाहिए ।
  • मेरुदण्ड, पीठ और कमर की किसी भी समस्या या रोग से पीड़ित व्यक्ति भूलकर भी इसे न करें।
  • गर्भवती स्त्रियाँ और उच्च रक्तचाप, साइटिका, हृदयरोग, सर्वाइकल, स्पॉण्डिलाइटिस से पीड़ित रोगी न करें।

लेखन एवं संकलन -:
योगाचार्य पं. मिलिन्द्र त्रिपाठी (M.Sc yoga therapy

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