परशुराम प्राणायाम अद्भुत लाभ व विधि

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अनेक लोग वर्षो तक प्राणायाम करते है लेकिन गलत तरीके से किया गया प्राणायाम प्रयलयकारी होता है । प्राणायाम दिखने में बेहद सरल नजर आते है लेकिन उनकी गहराई उतनी ही अधिक होती है.आज मैं आपको परशुराम प्राणायाम के बारे में बताने जा रहा हूं जो बेहद अद्भुत है ।

परशुराम प्राणायाम अद्भुत लाभ जानकर हैरान रह जाएंगे आप ,क्यो इतना असरकारक है -:

गलत प्राणायाम करने से बेहतर है किसी उच्च शिक्षित, प्रशिक्षित योगाचार्य की देखरेख में प्राणायाम सीखा जाए फिर उसे अपनाया जाए । आज मैं आपको परशुराम प्राणायाम के बारे में बताने जा रहा हूं जो बेहद अद्भुत है । सिर्फ इस एक प्राणायाम को करने से ही अनेक प्राणायाम के बराबर लाभ हमे मिल जाते है ।

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यदि आप प्राणायाम की साधना को सच मे लगन से करना चाहते है तो आपको लंग्स की क्षमता का विकास करना बेहद जरूरी है । यदि आपको साँसों को बेहतर करना है तो परशुराम प्राणायाम बहुत मददगार सिद्ध होगा । परशुराम प्राणायाम को कपालभाति के मुकाबले बहुत ज्यादा कारगर माना गया है ।

गलत कपालभाति करने की संभावना अधिक है लेकिन परशुराम प्राणायाम इतना सरल है कि इसे आसानी से सीखकर किया जा सकता है । इसमें गलत होने की संभावना भी नगण्य रहती है ।असल मे कपालभाति सिर्फ शुद्धि क्रिया है लेकिन आम बोलचाल में वह प्राणायाम के तौर पर ही प्रचलित है ।

प्राणों को आयाम देना अर्थात साँसों की क्षमता को बढ़ाना इस कार्य मे परशुराम प्राणायाम को सिद्धता है । यह आपकी आंतरिक शक्ति को अद्भुत रूप से बढ़ाता है ।

कपालभाति में साँसों को छोड़ने की क्रिया ताकत के साथ कि जाती है जिस कारण से शरीर को पर्याप्त मात्रा में प्राण नही मिल पाता है । शरीर के अनेक सूक्ष्म हिस्सो में प्राण का प्रवाह रुक जाता है ।

योग ऋषि कहते है कि साँसों को देर तक छोड़ने से चन्द्रनाड़ी जाग्रत हो जाती है । चन्द्र नाड़ी जाग्रत होने से हमे शांति का अनुभव होता है । चन्द्र नाड़ी का संबन्ध हमारे रिलेक्सेशन से है ।

जितनी लम्बी सांस छोड़ी जाती है उतनी अधिक शांति प्राप्त होती है । सोचिये कार्य पूर्ण होने पर हम क्या बोलते है कि अब जाकर चैन की सांस ली अर्थात लम्बी सांस ली ।

कोई भी व्यक्ति जब कठिन कार्य करता है तो उसे कार्य पूर्ण होने के शांति की आवश्यकता होती है तब यह शांति गहरी सांस से ही प्राप्त होती है । घबराहट के समय या बैचेनी होने पर आसपास उपस्थित ज्ञानी व्यक्ति यही राय देता है कि लम्बी लम्बी सांस लो । नाड़ी शोधन एवं अनुलोम विलोम में हम जितनी सांस लेते है उससे दोगुनी सांस छोड़ने का कहा जाता है

लेकिन कपलाभांति में ऐसा नही होता इस कारण अनेक योग विशेषज्ञ आज के दौर में सिर्फ युवाओ को ही कपालभाति कराते है । अस्वस्थ व्यक्ति को कपालभाति से दूर ही रहने की सलाह दी जाती है ।

परशुराम प्राणायाम में हम स्लो ब्रीदिंग करते है जिसके कारण शरीर के हर आंतरिक भाग में आक्सीजन का प्रवाह बढ़ जाता है आंतरिक अंग जितना आक्सीजन ले पाएंगे तभी तो वो पूरे शरीर मे आक्सीजन का प्रवाह संतुलित कर पाएंगे ।

योग गुरु धीरज जी बताते है कि इस प्राणायाम का नाम परशुराम जी के नाम पर है क्योंकि जिस तरह उन्होंने पापियों का नाश किया था ऐसे ही यह प्राणयाम शरीर के अंदर से गलत तत्वों का नाश करता है ।

गहरी सांस से लंग्स का एक एक चेम्बर प्रयोग होगा -:

गहरी सांस लेने से हमारे लंग्स को बहुत लाभ होता है । उसके एक एक चेम्बर में शुद्ध आक्सीजन का प्रवाह बढ़ता है । जो शरीर के लिए बेहद लाभदायक होता है ।

परशुराम प्राणायाम माइग्रेन ,अस्थमा ओर साँसों के मरीज के लिए वरदान है -:

परशुराम प्राणायाम अस्थमा एवं साँसों के मरीज के लिए वरदान है । सांस सम्बंधित रोगों में इस प्राणायाम के रिजल्ट बहुत सकारात्मक प्राप्त हुए है ।सामान्य सर दर्द होने पर या माइग्रेन के असहनीय दर्द में भी इसे नियमित करने वालो को बहुत लाभ प्राप्त हुआ है । मेरी योग क्लास में इन बीमारियों से ग्रसित स्टूडेंट्स को कम समय मे बेहद लाभ प्राप्त हुआ है ।

  • यह इम्युनिटी बूस्टर प्राणायाम है-:

साँसो से भरकर जब पेट को फुलाते है तब डायफ्राम नीचे की ओर जाता है एवं साँसों को खाली करते है जब पेट अंदर की ओर जाता है और डायफ्राम ऊपर की ओर जाता है जिसके कारण हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता में इजाफा होता है । कोरोना काल मे परशुराम प्राणायाम रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में बहुत सहायक सिद्ध हुआ है ।

  • 100 गुना ज्यादा रोग नाशक है –:


यह प्राणायाम 100 गुना ज्यादा रोग नाशक है । यह प्राणायाम लम्बे समय तक किया जा सकता है । जैसे कपालभाति क्रिया को अधिकतम 5 मिनट से अधिक नही करना चाहिए लेकिन परशुराम प्राणायाम को हम आधे घण्टे तक भी कर सकते है । उच्च स्तर के योग साधक कपालभाति क्रिया को केवल नासिका छिद्र शुद्धि हेतु इस्तेमाल करते है । जबकि परशुराम प्राणायाम गहराई तक असरकारक है ।

  • मन को साधने की डोर है सांस -:

सांस मन को साधने की डोर है । अनेक लोग ध्यान करने की शुरुआत में साँसों पर ही ध्यान केंद्रित करके ध्यान का अभ्यास करते है । परशुराम प्राणायाम में भी हम साँसों पर नियंत्रण करने का अभ्यास करते है । देर तक साँसों को रोक कर रखने का अभ्यास करते है । जिस कारण मन पर भी हमारा नियंत्रण होने लगता है । इसके दूसरे चरण में जब हम साँसों को होल्ड करते है तब मन एकदम शांत हो जाता है ।

  • कम समय मे ज्यादा लाभकारी –:

जितना हम शरीर को रिलेक्स करते है उतना ही शरीर के अंगों की मरम्मत होगी । शरीर के अंगों की मरम्मत के लिए हमारा आराम करना बेहद जरूरी है । अनेक बार चोट लग जाने पर डॉक्टर सलाह देते है कि जिस हिस्से में चोट लगी है उसे आराम दिया जाए । ताकि चोट की जल्द से जल्द मरम्मत हो जाती है । परशुराम प्राणायाम से भी शरीर को बहुत रिलेक्स मिलता है । जिस कारण यह शरीर के आंतरिक अंगों की मरम्मत में बेहद उपयोगी भूमिका अदा करता है ।

परशुराम प्राणायाम को करने की विधि -:


परशुराम प्राणायाम करने के लिए सर्वप्रथम सुखासन में बैठ जाये । (सामान्य अवस्था मे बैठ ) अब रीढ़ की हड्डी को एकदम सीधा रखते हुए धीरे धीरे पेट को फुलाते हुए सांस से पूरा पेट गुब्बारे के समान फुला लीजिये । इसके बाद साँसों को पेट को दबाते हुए चेस्ट में स्थानांतरित कर चेस्ट को फुला लें । इसके बाद साँसों को कुछ देर होल्ड करें । अब एक साथ नाक से सांस को खाली करें एवं शेष साँसों को मुहं से o (अंग्रेजी वर्णमाला के ओ अक्षर की तरह )आकर बनाकर देर तक फूंक मारते हुए साँसों को देर तक बाहर करें । यहां एक चक्र पूर्ण हो गया है यहां से पुनः इन्ही चरणों की पुनरावृत्ति करें ।

(योग गुरु धीरज जी द्वारा इस प्राणायाम के बारे में मुझे सर्वप्रथम मार्गदर्शन प्राप्त हुआ था । यह लेख उन्ही को समर्पित करता हूँ । )

लेखन -: योग गुरु डॉ.मिलिन्द्र त्रिपाठी (योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ

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