सम्पूर्ण योग क्या हे योगा के उद्देश्य और इतिहास What is yoga

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सनातन वैदिक धर्म-

प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों द्वारा जो धर्म मानव जाति के उद्धार के लिए प्रकाशित हुआ और बताया गया की योग क्या हे उसमें सम्पूर्ण योग साधन को प्रधान स्थान पर रखा जाता है। यदि मानव धर्म से योग साधन को पूर्णतया हटा दिया जाए तो फिर उसमें कोई विशेष महत्व की बात ही नहीं रह जाएगी।

योगसाधना का ऐसा महत्व अपने सनातन वैदिक धर्म में बताया गया है।   अगर अपनी भाषा का निरीक्षण किया जाए तो उसमें भी योग की सार्वत्रिक उपयोगिता का पता लगता है।भाषा में प्रयोग संयोग, वियोग,प्रयोग, नियोग, अभियोग इत्यादि अनेक शब्द प्रयोग में आते हैं।

यह सब भी सम्पूर्ण योग क्या  हैं। क्या यदि इन योगों का उपयोग भाषा में न किया जाए तो भाषा कितनी अधूरी हो जाएगी, इसका ज्ञान प्रत्येक भाषा भाषी को सहज में ही हो सकता है।  

भाषा में योग का यह सार्वत्रिक प्रयोग-

  सिद्ध करता है कि भाषा की पूर्णता के लिए योग की अत्यन्त आवश्यकता है। योग क्या हे ? भाषा आत्मा का ही प्रकाश है। आत्मा बुद्धि के साथ युक्त होकर अपने जो भाव प्रकट करता है वही भाषा है।अर्थात भाषा आत्मा का भाव है अथवा प्रभाव है।और वह पूर्वोक्त योगों के बिना प्रगट नहीं हो सकता।

  इसीलिए कहा जाता है कि आत्मा का प्रकाश प्रकट होने के लिए योग आवश्यकता है। आर्य वैद्यक में औषध-योजना को हे। ज्योतिषशास्त्र में ग्रहों के योग को भी योग कहा जाता है।गणित शास्त्र में भी योग है। इस तरह देखा जाए तो योग के बिना कोई शास्त्र नहीं है, यह बात स्पष्ट हो जाएगी।  

योग क्यों जरूरी है :-   

हम जीवन भर पैसो के पीछे भागते है लेकिन स्वास्थ्य के प्रति ध्यान नही देते है । हमारे जीवन के सारे प्लान 100 साल की उम्र को ध्यान में रखकर बनते है लेकिन आजकल छोटी उम्र में अचानक आये हार्ट अटैक जीवन को कम उम्र में ही समाप्त कर देते है । परिवार के सपने अधूरे हो जाते है । बच्चे का भविष्य चौपट हो जाता है ।

  फिर भी लोग अपनी दिनचर्या को तहस नहस करके जीवन जीते है । देर रात तक मोबाइल ,टीवी में व्यस्त रहकर सुबह 9 बजे तक उठकर भागदौड़ी में तैयार होकर ऑफिस जाना । फिर शाम को घर आकर टीवी के सामने बैठ जाना ।   ऑफिस में दिनभर बैठना ,दुकान पर दिनभर बैठना, घर आकर दिनभर बैठना शरीर को जितना आराम दिया गया शरीर उतना बर्बाद हुआ है । केवल 1 घण्टा योग को देने से हमे पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त होगा ।  

अंग्रेजी में एक शानदार कहावत है, हेल्थ इज़ वेल्थ यानी स्वास्थ्य ही धन है। इस कहावत को जानते सब है लेकिन मानने वाले बेहद कम है । कहते है अगर स्वास्थ्य अच्छा हो तो धन कभी भी कमाया जा सकता है। मगर आज के समय में हम अपने स्वास्थ्य को पूरी तरह दरकिनार कर सिर्फ पैसा कमाने की अंधी होड़ में लगे रहते हैं।

  सभी जानते है कि हमारा स्वास्थ्य अच्छा हो तो ज़िंदगी आसान हो जाती है। ज़िंदगी को बेहतर ढंग से खुश होकर जीने के लिए ज़रूरी है कि हम मानसिक और शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ रहें। इसके लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है ‘योग’ । एक कहावत बिल्कुल सटीक है  ‘योगा से ही होगा’, यह बात शत- प्रतिशत सच है। योग के अनेक फायदे हैं। जिन्हें हम सब जानते है लेकिन फिर भी योग को अपनाते नही है ।  

योग में जटिल से जटिल बीमारी से बचने का इलाज छुपा है, फिर चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक। लेकिन कब तक बीमार होने का इंतजार करें । क्यो न आज ही योग को जीवन मे अपनाए ताकि अस्पतालों में लगने वाले लाखों रुपयों को बचाया जा सकें बेहतर स्वास्थ्य के लिए योग से अच्छा विकल्प और कुछ नहीं है।  

अनेको लोग सोचते हैं कि योगासनों का मतलब शरीर के आड़े-टेढ़े पोज़ हैं, जिन्हें करना बहुत कठिन है, तो आपको योगासनों के बारे में और ज्यादा जानने की जरूरत है।  

डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ फिजियोलॉजी एंड अलायड साइंसेज (डीआईपीएएस) के अनुसंधानकर्ताओं ने एक अध्ययन में यह दावा किया कि नियमित एवं लम्बे समय तक योग करने से दिल से संबंधित कार्डियोमेटाबोलिक जोखिम के कारकों में परिवर्तन एवं पुरूषों में मस्तिष्क से उत्पन्न होने वाले न्यूरोट्रॉफिक कारकों द्वारा उत्पन्न उम्र संबंधी विकार को रोकने में सहायता मिल सकती है। डीआईपीएएस रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की एक प्रयोगशाला है।अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार 20 से 30 की उम्र तक मस्तिष्क का विकास हो जाता है। इसके बाद हमारे मस्तिष्क का विकास थम जाता है और 40 की उम्र के बाद इसमें कमियां आने लगती हैं।”  

योग क्या हे सम्पूर्ण योग की व्यापकता-

  यहां तक है कि वियोग में भी योग की आवश्यकता है फिर संयोग में आवश्यकता है। यह कहने की तो आवश्यकता ही क्या है? इस तरह भारतीय ऋषि-मुनियों तथा तपस्वियों ने योग का मानव जीवन के साथ अटूट संबंध देखा और अनुभव भी किया। इस समय में भी प्रत्येक व्यक्ति को इस संबंध का अनुभव करना चाहिए।

  सभी शास्त्रों में योग कहा गया है। पातंजल योगदर्शन में योग साधना का ही विचार किया गया। कपिल मुनि की सांख्य दर्शन ने भी सांख्ययोग कहा है। पूर्व मीमांसा में कर्म योग कहा है;उत्तर मीमांसा में ब्रह्मयोग है। श्रीमद्भागवत आदि पुराणों में भक्ति योग है।   इस तरह अनेकानेक ग्रन्थो में योग तत्व का विवेचन देखने को मिलता है।

अतः हम कह सकते हैं कि सभी शास्त्रों इत्यादि का एकमात्र उद्देश्य ही है कि धर्म जिज्ञासु के मन में योग तत्व को स्थिर कर दिया जाए। वर्तमान परिदृश्य में लोग समझते हैं कि भक्तियोग,कर्मयोग, ज्ञानयोग, हठयोग, ध्यानयोग इत्यादि सभी पृथक्-पृथक् है और एक का दूसरे के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है।

यह विचार इतना दृढ़ हो गया है. Benefits of yoga   योग मार्ग का अनुसरण करने वाला साधक भी अपने आपको दूसरों से पृथक् समझते हैं,अर्थात भक्ति मार्ग के लोग अपने आपको हठयोगियों से अलग मानते हैं।इसी तरह ज्ञानमार्गीयो का कर्म मार्गियों से विरोध स्पष्टतया दृष्टि गोचर होता है।  

यदि यह सब मार्ग भिन्न-भिन्न है तो यह निश्चित है कि इनमें से कोई मार्ग संपूर्ण योग  नहीं है।जो योग संपूर्ण होगा वह किसी से भिन्न नहीं हो सकता।हठयोगी कहते हैं कि हम आसन- प्राणायामादि के अभ्यास के द्वारा प्राण स्थित करते हैं और चित्त की एकाग्रता साधते हैं।ज्ञान योगी कहते हैं कि हम विशेष मननादि साधन से स्थिरता का साधन करते हैं।  

इसी तरह कर्म योगी कहते हैं कि हम कर्म करने में ही अपना जीवन समर्पित कर देते हैं।भक्त कहते हैं कि हम नाम स्मरण आदि करते हैं। इस तरह प्रत्येक साधक अपने मार्ग को एक दूसरे से पृथक समझता है। इसका फल यह होता है कि हठयोगी साधनों से शरीर और प्राणायाम के द्वारा प्राणों पर विजय प्राप्त करता है।

  ज्ञान योगी मनन के द्वारा मन पर अच्छे संस्कार जमाता है। कर्म योगी कर्मेन्द्रियों से प्रयत्न करता है तथा भक्ति मार्गी नामस्मरण आदि में ही लगा रहता है। इनमें से एक शरीर का आशय करता है दूसरा प्राण पर निर्भर करता है तीसरा मन का उपयोग करता है। चौथा कर्मेन्द्रियों का उपयोग करता है और पांचवा स्मरणशक्ति का आश्रय लेता है।

  इस तरह इनमें से एक भी संपूर्ण मानव शक्तियों का प्रयोग नहीं करता।हर एक प्रकार का साधक एक-एक शक्ति का उपयोग करता है और इसीलिए अपने आपको दूसरे से पृथक् अनुभव करता है।तथा इस पृथकृत्व में उसे अपूर्णता का भी अनुभव होता है। मनुष्य के पास आत्मा, बुद्धि ,मन ,प्राण, इन्द्रियां पञ्चमहाभूत आदि अनेक पदार्थ है।

  इन सबका एक साथ योग होने पर ही “संपूर्ण योग” हो सकता है जो यह कहते हैं कि हम केवल प्राणों का साधन करते हैं अथवा केवल अपने आत्मा को ही परमात्मा के साथ मिलाते हैं,वे अंश का सम्पूर्ण योग करते हैं, उनके संपूर्ण अङ्गो के साथ योग नहीं होता है। अतः वे अपूर्ण योग करते हैं और अपने आपको को अलग मानते हैं।  

वस्तुतः देखा जाए तो केवल एक ही शक्ति का प्रयोग करना असंभव है। अर्थात् हठयोगी जो यह कहते हैं कि हम आसन प्राणायाम आदि के द्वारा केवल शरीरावयव और प्राण का ही अनुष्ठान करते हैं।वे गलती करते हैं।आत्मा, बुद्धि,मन,प्राण एवं पञ्चमहाभूत आदि सब का उपयोग किए बिना न हठयोग का अनुष्ठान किया जा सकता है और न ही अन्य योगों का अनुष्ठान सम्भव है।  

योग विद्या सर्वश्रेष्ठ विद्या है -:

  अनादिकाल से ही भारतीय चिन्तन एवं साधना परम्परा प्रवाहित होती आ रही है जिसमें योग विद्या भी सम्मिलित हैं।विविध ज्ञान विज्ञानों के मध्य”योग”का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि परमगति प्राप्ति के लिए योग से बढ़कर अन्य कोई दूसरा मार्ग दृष्टिकोण में नहीं आता है।

  महाभारत में श्रीशुकदेवजी कहते हैं-न तु योगमृते प्राप्तुं शक्या सा परमागति:’एवं श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी आया है”न तस्य रोगो न जरा न मृत्यु:प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम्” तथा आयुर्वेद के आचार्य चरक के सिद्धांत योगविषयक प्राप्त होते हैं-“योगे मोक्षे च सर्वेषां वेदनानामवर्तनम्।योगे निवृत्ति:नि:शेषा योगो मोक्षप्रवर्तक:”।।  

इस तरह योग के विषय में घेरण्डसंहिताकार भी वर्णन करते हैं_”नास्ति माया हम:पाश:नास्ति योगात्परं बलम्”।।इन सब प्रमाणों से सिद्ध होता है कि योग निश्चत ही प्राणियों के चरम लक्ष्य त्रिविध दु:खो से आत्यन्तिक निवृत्ति का मार्ग प्रशस्त कर परमगति (कैवल्य)की प्राप्ति में अत्यंत उपयोगी है।  

भगवान् शिव को प्रथम योग का निर्माता माना जाता है। इन्होंने ही इस गुप्त ज्ञान को देवी पार्वती को सर्वप्रथम दिया।यह योगशास्त्र परम्परा में मन्त्रयोग, हठयोग,लययोग तथा राजयोग रुपी सिद्धान्तो में चार प्रकार से विभक्त है जो वस्तुत:एक है l   लेकिन साध्य और साधन की दृष्टि से अथवा उत्तरोत्तर वैशिष्ट्य की दृष्टि से अलग अलग परिभाषित किया गया है।

योग के इन चार सिद्धांतों में प्रतिपादन,स्थान एवं साध्य की दृष्टि से वैचित्र्य दृष्टिगत होने पर भी प्रतिपाद्य तत्त्व अर्थात् अन्तर्निहित एक मुख्य तत्त्व का बोध होता है जो इन योगों द्वारा ही सम्भव है। इनका ध्येय श्रेष्ठता को प्राप्त अन्तिम योग अर्थात् राजयोग ही अभीष्ट है।।  

क्या है रिसर्च :-

दुनिया के तमाम रिसर्च और अध्ययनों में ये साबित हो चुका है कि लगातार योगासन करने से शरीर संपूर्ण स्वस्थ रहता है और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां जैसे- हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, हार्ट अटैक आदि के खतरे कम हो जाते है। इसके अलावा योगासन से शरीर लंबे समय तक बूढ़ा नहीं होता है।   योग से शरीर, मस्तिष्क और आत्मा का एक साथ मिलन होता है। नियमित रूप से जीवन मे योग अपनाने से मस्तिष्क की आयु को बढ़ने से रोका जा सकता है और यह जवां बने रहने में आपकी मदद कर सकता है। यह बात हम नही कह रहे बल्कि रिसर्च में निकल कर सामने आई है ।

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